ख़ामोशी की गूँज

नमस्कार दोस्तों दोस्तों मैं सुधीर सनवाल 1 स्टोरी टेलर आज आपको अपनी 1 कहानी सुना रहा हूँ कहानी का नाम है खामोशी की गूंज ये कहानी जो है ये मेरे साथ घटित हुई थी जब मैं 1 बार मधुरई के लिए गया था मुझे कुछ काम था और मैं ट्रेन से मधुरई तक का सफ़र कर रहा था दिल्ली से मधुर तो उस दौरान उस जर्नी में मुझे रास्ते में ये घटना गठित हुई और इसने मेरे ऊपर इतना प्रभाव डाला कि जैसे ही मैं अपने काम से फ्री हुआ और मैं वापस लौट के आया तो मुझे लगा कि इस पूरे संस्मरण को 1 कागज पर उतारना बहुत जरूरी है और बस मैं उस संस्मरण को कागज पर उतारा और उसने 1 कहानी का रूप ले लिया कहानी हाल की छोटी है लेकिन फिर भी यहाँ सुनाने पर उसको 2 भागों में सुनाना होगा तो मैं शुरू करता हूँ भाग 1 दिल्ली से मधुरई तक की लम्बी यात्रा में रेलगाड़ी के कोच में सुस्त भाव रहित और 1 दूसरे से अनजान यात्रियों से इतर वह नौजवान प्रफुल्लित ओजपूर्ण और जैसे अपने जीवन के 11 पल को 1 सुंदर स्वप्न के समान जी लेना चाहता था रेल गाड़ी की खिड़की से बाहर देखने पर जो तेजी से सरकते हुए पेड़ खेत कल्यान और अन्य दृश्य थे वह बाकी यात्रियों के लिए और स्वयं मेरे लिए भी किसी सामान्य सी बात से अधिक कुछ न थे परन्तु उसकी उत्सुकता तो कह रही थी कि वह प्रत्येक दृश्य को अपनी आँखों में भर लेना चाहता था मैं हैरान था उसके ऐसे व्यवहार से क्योंकि उसके अन्य हावभाव और गतिविधियों से ऐसा कहीं नहीं लगता था कि वो रेल गाडी में पहली बार ही बैठा हो अक्सर हम लोग जब रेल का सफर करते हैं और लम्बा सफर होता है तो कोई किताब पढ़कर कोई खाली सोकर या कोई खिड़की से बाहर झांकते हुए ही समय बिताता है आजकल तो मोबाइल हैं तो मोबाइल से काफी टाइम हमारा पास हो जाता है लेकिन उस नौजवान को मैंने देखा और ये बात आज से तकरीबन 12 से पंद्रह साल पुरानी है जब मोबाइल फोन तो थे लेकिन स्मार्टफोन्स नहीं होते थे तो आजकल की तरह जैसे हम रील्स देख के टाइम पास कर लेते हैं या यू ट्यूब देख लेते हैं ऐसा नहीं था दोपहर के लगभग 12 बज रहे थे खा पीकर और बाकी सभी जरूरी चर्चाओं के बाद लोग अलसाये से पड़े थे कोई शोर था तो बस रेल गाड़ी के पहियों की जोरदार खटर पटर का मैं भी अपनी ऊपर की बर्थ पर लेटा नॉर्मन विंसेंट पील द्वारा लिखित सकारात्मक सोच की शक्ति द पॉवर ऑफ़ पॉजिटिव थिंकिंग पुस्तक पढ़ रहा था बीच में मैं जब भी किताब से नजरें हटाता तो मुझे बरबस ही खिड़की से बाहर झांकता हुआ युवक दिखाई देता मैं उसे देख ही रहा था कि अचानक वह भी पीछे मुड़ा और मेरी ओर देखकर मुस्कराया कभी कभी तो किसी की मुस्कराहट के प्रत्युत्तर में मुस्कराना भी हमारे लिए गंभीर और संवेदनशील मुद्दा बन जाता है इससे पहले कि मैं भी कोई निर्णय लेता उसने झट से अपने मोबाइल पर अपना नाम टाइप करके मेरे हाथ में पकड़ा दिया मैं उसकी इस हरकत से 1 बारगी तो स्तब्ध सा रह गया परन्तु उसके चेहरे के सुंदर और तीखे नए नक्श और आनंदित भाव भंगिमाओं के ओज से सम्मोहित होकर उसे अपना नाम लिखकर मोबाइल वापस कर दिया उसने फिर कुछ लिखा और मोबाइल मुझे पकड़ा दिया और मैं भी उसी तरह उसके प्रश्नों के उत्तर देता रहा मैं मन ही मन उसकी बुद्धिमता की दाद दे रहा था कि रेलगाड़ी के शोर और ऊपर नीचे बर्थ की दूरी को कैसे उसने बखूबी इस आधुनिक तकनीक से पाट दिया अब तो मुझे किताब से अधिक उससे बात करने में ज्यादा आनंद आ रहा था और हमारे बीच का संवाद का सिलसिला बहुत देर तक यूँ ही लिख कर चलता रहा तो आगे की कहानी पार्ट टू में

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